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देवनागरी लिपि - उत्पत्ति, नामकरण व विशेषताएँ | Devanagari Lipi

देवनागरी लिपि Devanagari Lipi वर्तमान समय में प्रचलित समस्त लिपियों में सर्वाधिक व्यवस्थित, समर्थ एवं वैज्ञानिक लिपि है। देवनागरी लिपि में हिंदी भाषा के अतिरिक्त अनेक भारतीय भाषाएँ जैसे संस्कृत, मराठी,  मैथिली, कोंकणी एवं कतिपय विदेशी भाषाएँ भी लिखी जाती हैं। उदहारणतः नेपाली भाषा भी देवनागरी लिपि में ही लिखी जाती है। यह लिपि भारत की अनेक लिपियों के सन्निकट है।


देवनागरी लिपि उत्पत्ति, नामकरण, विशेषताएँ, गुण, वैज्ञानिकता | devanagari lipi


हम इस आलेख के अंतर्गत देवनागरी लिपि की उत्पत्ति, इसका नामकरण, विशेषताएँ तथा देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता, गुण-दोष आदिक तथ्यों के बारे में संक्षेप में जानेंगे।

देवनागरी लिपि की उत्पत्ति


देवनागरी लिपि की उत्पत्ति मूलतः ब्राह्मी लिपि से हुई है। आर्यों के द्वारा प्रयुक्त की गई ब्राह्मी लिपि, संभवतः दुनिया की सर्वाधिक परिपूर्ण प्राचीन लिपि है। समस्त भारतीय लिपियों का जन्म (उर्दू और सिंधी के अतिरिक्त) ब्राह्मी लिपि से हुआ है। तीसरी-चौथी शताब्दी से ही भारतवर्ष में ब्राह्मी लिपि का प्रचलन था।

इसी ब्राह्मी लिपि से देवनागरी लिपि विकसित हुई और सातवीं शताब्दी के आसपास से व्यवहृत होने लगी। कुछ विद्वान इसे ब्राह्मी लिपि ही मानते हैं जिसमें किंचित् परिवर्तन के साथ उसका नाम देवनागरी हो गया।

फिर भी, यहाँ एक बात ध्यान रखनी आवश्यक है कि देवनागरी लिपि भले ही ब्राह्मी लिपि से उद्भूत हो, किन्तु अपने विकासक्रम में उसने फारसी, गुजराती, रोमन आदिक लिपियों से भी तत्वों को ग्रहण किया और एक परिपूर्ण लिपि के रूप में विकसित हुई। यथा- विराम चिह्नों का अधिकाधिक प्रयोग देवनागरी में, रोमन लिपि के प्रभाव से है।

इसका कारण यह है कि संस्कृत भाषा कारक-विभक्ति आदि के व्याकरणिक नियमों से इस प्रकार कसी हुई है कि उसके लिए विराम-चिह्नों की अधिक आवश्यकता ही नहीं थी। हाँ! जब उसका प्रयोग हिंदी जैसी नवीन भाषाओं के लिए शुरू हुआ तो स्पष्टता के लिए विराम-चिह्नों का प्रयोग आवश्यक हो गया। हिंदी भाषा की अनेक विशेषताएँ देवनागरी लिपि के प्रयोग के कारण हैं। 

 

देवनागरी लिपि का नामकरण


देवनागरी लिपि के नामकरण के विषय में विद्वानों में मतभेद हैं। देवनागरी के नामकरण से संबंधित निम्नलिखित विचारधाराएँ हैं जिनके आधार पर इस लिपि के नामकरण का निर्णय किया जा सकता है-

  • देवनागरी लिपि के नामकरण के संबंध में पहला और प्रमुख सिद्धान्त यह है कि 'देवनगर' में प्रयोग के कारण इस लिपि का नाम देवनागरी पड़ा।

प्राचीन काल में देवी-देवताओं की पूजा कुछ विशेष संकेतों और चिह्नों के द्वारा होती थी जो विभिन्न प्रकार की आकृतियों यथा- त्रिकोण, चतुर्भुज आदि के मध्य लिखे जाते थे। इन आकृतियों को 'देवनगर' कहा जाता था। देवनगर के मध्य लिखे जाने के कारण इस लिपि का नाम देवनागरी पड़ा। 

  • गुजरात के देवनगर नामक स्थान से संबंधित होने के कारण इस लिपि का नामकरण देवनागरी के रूप में हुआ, यह सिद्धान्त भी भाषाविदों के मध्य प्रचलित है। देवनागरी लिपि का सर्वाधिक प्राचीन प्रामाणिक लेख गुजरात में ही (706 ई0) प्राप्त हुआ जो इस सिद्धान्त कि पुष्टि करता है। 

  • अपने प्रादुर्भाव के तुरंत बाद इस लिपि ने संस्कृत भाषा को सुशोभित किया। चूँकि संस्कृत को देवभाषा कहा जाता है, इसलिए इसका नाम देवनागरी लिपि हो गया।

  • गुजरात के नागर विद्वानों के द्वारा प्रयोग किए जाने के कारण भी कुछ विद्वान इसका नाम देवनागरी होना मानते हैं। 

  • नगरों में प्रचलित होने के कारण इसका नाम देवनागरी पड़ा, कुछ विद्वान ऐसा भी मानते हैं।

देवनागरी लिपि की विशेषताएँ / गुण 


१. देवनागरी लिपि ध्वन्यात्मक है। ध्वन्यात्मकता देवनागरी लिपि की सर्वप्रमुख विशेषता है। ध्वन्यात्मकता को सरल भाषा में समझें तो इसका अर्थ है-"जैसा बोला जाए वैसा लिखा जाए और जैसा लिखा जाए वैसा ही बोला जाए।

२. देवनागरी में प्रत्येक लिपि चिह्न का एक निश्चित ध्वन्यात्मक मूल्य है। इसके द्वारा उच्चरित ध्वनियों को व्यक्त करना बहुत सरल है।

३. देवनागरी लिपि एक वैज्ञानिक लिपि है। इस लिपि में वर्णों का संयोजन बहुत ही व्यवस्थित, सुसंगठित व क्रमबद्ध ढंग से किया गया है।


देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता स्वयं सिद्ध है। - 'आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी'


४. प्रत्येक वर्ण को उसकी विशेषता और प्रकार्य के आधार पर स्थान प्रदान किया गया है। स्वरों तथा व्यंजनो की सुनियोजित एवं क्रमबद्ध व्यवस्था है।

५. देवनागरी लिपि में हरेक ध्वनि के लिए एक लिपि चिह्न निश्चित है। जैसे- 'कला' शब्द में 'क' की ध्वनि के लिए एक लिपि चिह्न 'क' नियत है। इस ध्वनि के 'K' 'C' अथवा 'Q'  आदि अनेक चिह्नों का भ्रामक प्रयोग नहीं होता।

७. लिपि चिह्नों की अधिकता देवनागरी की एक प्रमुख विशेषता है। देवनागरी लिपि में 52 से अधिक लिपि चिह्नों और कुछ अन्य आगत वर्णों (ऑ, फ़ ) का प्रयोग होता है, जो प्रायः हर प्रकार की ध्वनि को लिपिबद्ध करने में सक्षम हैं।

८. देवनागरी की वर्णमाला सर्वाधिक व्यवस्थित वर्णमाला है। इस वर्णमाला में सभी वर्णों को उनकी उच्चारणादि विशेषताओं के आधार पर वर्गीकृत किया गया है।

उदाहरणतः कंठ से उच्चरित वर्णों को एक वर्ग 'क वर्ग' में रखा गया है। इसी प्रकार अल्पप्राण-महाप्राण वर्णों को भी एक निश्चित क्रम में रखा गया है। निश्चित ही देवनागरी लिपि में वर्णों का सुनिश्चित वर्गीकरण किया गया है।

९. व्यंजन चिह्नों की आक्षरिकता- देवनागरी लिपि में प्रत्येक व्यंजन के साथ 'अ' वर्ण का संयोग रहता है। जैसे- क्+अ = क । लिपि का यह गुण आक्षरिकता कहलाता है। इससे लेखन में समय और स्थान की बचत होती है।

इसके अतिरिक्त देेवनागरी की कुछ अन्य विशेषताएँ निम्नवत् हैं :


  • देवनागरी लिपि न तो शुद्ध रूप से अक्षरात्मक लिपि है न ही वर्णात्मक।

  • यह लिपि बायीं से दायीं ओर लिखी जाती है। 

  • इसमें जो ध्वनि का नाम है वही वर्ण का नाम है। 

  • इस लिपि में संयुक्त वर्णो का प्रयोग किया जाता है, यह भी इसकी एक विशेषता है। 

  • इसके लेखन और उच्चारण में पर्याप्त एकरूपता और स्पष्टता है।

देवनागरी लिपि में सुधार की संभावनाएँ


कुछ लोग देवनागरी लिपि के कतिपय दोष भी गिनाते हैं। यद्यपि ये दोष (असुविधायें) सामान्य प्रयोग की कम और कम्प्यूटर आदिक यंत्रों में प्रयोग की अधिक हैं।

  • देवनागरी में 'इ' की मात्रा (दि) को लेकर किंचित भ्रम की स्थिति है, क्योंकि इसका उच्चारण वर्ण के बाद होता है और लिखा पहले जाता है। इसमें सुधार की थोड़ी गुंजाइश है।

  • इसमें 'र' के विभिन्न रूपों का प्रयोग होता है जो स्पष्ट तो है लेकिन सामान्य व्यवहारकर्ता के लिए असुविधाजनक है। इनके टंकण में भी थोड़ी समस्या होती है।

  • संयुक्ताक्षरों का प्रयोग भी देवनागरी की विशेषता के साथ-साथ उसका एक दोष भी माना जा सकता है।

यदि उपर्युक्त कुछ समस्याओं का समुचित निवारण कर लिया जाय तो नागरी लिपि में सम्पूर्ण एकरूपता होगी और वह सर्वमान्य रूप से दुनिया की सर्वश्रेष्ठ लिपि बन जाएगी।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि देवनागरी लिपि अत्यंत व्यवस्थित और वैज्ञानिक लिपि है जो अपने गुणों और विशेषताओं के कारण बहुत ही समर्थ और सशक्त लिपि बन जाती है। 

देवनागरी लिपि Devanagari Lipi से सम्बंधित यह लेख आपको कैसा लगा, कृपया कमेंट के माध्यम से अवश्य बताएँ। यदि आपको लगता है कि यह जानकारी आपके किसी मित्र के लिए उपयोगी हो सकती है, तो इसे शेयर करके उसकी मदद करें। भारती हिंदी ब्लॉग से जुड़े रहने के लिए सब्सक्राइब (Subscribe) कर लें। 




देवनागरी लिपि - उत्पत्ति, नामकरण व विशेषताएँ | Devanagari Lipi देवनागरी लिपि - उत्पत्ति, नामकरण व विशेषताएँ | Devanagari Lipi Reviewed by Bal krishna Dwivedi on 12/06/2018 Rating: 5

बदला न अपने आपको जो थे वही रहे Ghazal - निदा फ़ाज़ली

निदा फ़ाज़ली की यह गजल Ghazal "बदला न अपने आपको" मेरी पसंदीदा ग़ज़लों में से एक है। इसका ये शेर 'जिसमें खिले हैं फूल" तो बहुत ही अच्छा है। आप भी पढ़ें यह खूबसूरत गजल Ghazal-


Ghazal बदला न अपने आप को जो थे वही रहे - निदा फाजली


बदला न अपने आपको जो थे वही रहे।
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे॥

अपनी तरह सभी को किसी की तलाश थी।
हम जिसके भी क़रीब रहे दूर ही रहे॥

दुनिया न जीत पाओ तो हारो न ख़ुद को तुम।
थोड़ी बहुत तो जे़हन में नाराज़गी रहे॥

गुज़रो जो बाग़ से तो दुआ माँगते चलो।
जिसमें खिले हैं फूल वो डाली हरी रहे॥

हर वक़्त हर मक़ाम पे हँसना मुहाल है।
रोने के वास्ते भी कोई बेकली रहे॥

~निदा फ़ाजली

मुझे उम्मीद है, आपको यह गजल Ghazal पसंद आयी होगी।


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बदला न अपने आपको जो थे वही रहे Ghazal - निदा फ़ाज़ली बदला न अपने आपको जो थे वही रहे Ghazal - निदा फ़ाज़ली Reviewed by Bal krishna Dwivedi on 10/22/2018 Rating: 5

नवरात्र पर्व का माहात्म्य : आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

नवरात्र पर्व देवी/शक्ति की पूजा का विशेष पर्व है जिसे पूरे भारत में हर्षोल्लास एवं आस्था पूर्वक मनाया जाता है। नवरात्र में नौ दिन का व्रत रखने, पूजन-हवनादि करने  व नियम-संयम पूर्वक रहने से देवी माँ की विशेष कृपा प्राप्त होती है। शक्ति की उपासना का यह पर्व वैदिक काल के भी पूर्व से मनाया जा रहा है और यह परंपरा देवनदी की अजस्र, अविरल धारा की भाँति अधुनातन प्रवाहमान है।


ॐ दुर्गा देव्यै नमोस्तुते!
चित्र साभार: स्पीकिंगट्री.इन  


नवरात्र का पर्व मुख्यत: वर्ष में दो बार मनाया जाता है। एक चैत्र मास में वासंतिक नवरात्र और पुनः आश्विन मास में शारदीय नवरात्र। उत्तर भारत के कुछ स्थानों पर आषाढ़ माह में 'आषाढ़ी' नवरात्र भी होता है। शारदीय नवरात्र शरद ऋतु के आरंभ में आश्विन मास की प्रतिपदा तिथि को आरंभ होता है और नवमी तिथि तक चलता है। प्रतिपदा तिथि को कलश-स्थापना की जाती है और नौ दिन विधि-विधान पूर्वक पूजन व दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है। पूजनोपरांत नवमी तिथि को हवन की जाती है। दसवें दिन दशहरा मनाया जाता है। इस वर्ष नवरात्रारम्भ अँग्रेजी तिथि के अनुसार १० अक्तूबर  सन् २०१८ को हो रहा है।



भगवान श्रीराम ने इसी शारदीय नवरात्र में देवी चंडी का पूजन लंका के समुद्र तट पर किया था। 


देवी के नौ रूप - नवदुर्गा 



नवरात्र के नौ दिन क्रमशः देवी के नौ रूपों की पूजा होती है जिन्हें हम नवदुर्गा कहते हैं। नवदुर्गा के नौ रूप इस प्रकार हैं-



प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।।(श्रीदुर्गासप्तशती )


उपर्युक्त श्लोक के अनुसार-


प्रथम          शैलपुत्री

द्वितीय        ब्रह्मचारिणी

तृतीय         चन्द्रघण्टा

चतुर्थ          कूष्माण्डा

पंचम          स्कंदमाता

षष्ठम          कात्यायनी

सप्तम        कालरात्रि

अष्टम         महागौरी

नवम         सिद्धिदात्री


ये दुर्गा के नौ रूप नवदुर्गा के नाम से जाने जाते हैं और नवरात्र के नौ दिन क्रमशः इन्हीं रूपों की पूजा होती है।



             ॐ नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता: स्मताम्।। 
ॐ नमश्चंडिकायै!


नवरात्रि का माहात्म्य : पौराणिक कथा



लंका-युद्ध के समय ब्रह्माजी ने रावण का वध करने के लिए राम से चंडी देवी को प्रसन्न करने को कहा और उनकी पूजा का सम्पूर्ण विधान बताया। ब्रह्माजी के निर्देशानुसार पूजन सामग्री की व्यवस्था की गयी। इसमें हवन के निमित्त १०८ दुर्लभ नीलकमल की भी व्यवस्था की गयी और श्रीराम ने देवी के प्रीत्यर्थ पूजन अनुष्ठान आरंभ किया। 



यह बात रावण को भी पता चली। उसने भी अपनी जीत के लिए चंडी देवी को प्रसन्न करने का पूजन-विधान आरंभ कर दिया। समांतर ही, राम की पूजा सम्पन्न न होने पाये यह विचारकर अपनी मायावी शक्ति से पूजा के लिए लाये गए १०८  दुर्लभ नीलकमलों में से एक पुष्प गायब कर दिया। तत्समय नीलकमल मिल पाना असंभव प्रतीत हो रहा था। ऐसे में अनुष्ठान का संकल्प टूट जाता।  तभी नीलकमल के समान नेत्रों वाले प्रभु श्रीराम संकल्प पूर्ण करने के उद्देश्य से अपना एक नेत्र देवी को समर्पित करने के लिए तूणीर से तीर निकालने को उद्यत हुए। तत्क्षण देवी माँ प्रकट हुईं और राम के समर्पण से प्रसन्न होकर उन्हें विजयश्री का वरदान दिया। 



नवरात्र का वैज्ञानिक महत्व 



जैसा कि विदित है, नवरात्र वर्ष में मुख्य रूप से दो बार मनाया जाता है- वसंत ऋतु में और शरद ऋतु में। दोनों ही ऋतुओं का यह काल संक्रमण का काल होता है। वातावरण में त्वरित परिवर्तन देखने को मिलता है और वायु में रोगाणुओं की संख्या बढ़ जाती है और वे सक्रिय हो उठते हैं। स्वाभाविक रूप से इस संक्रमणकाल में रोग-बीमारियों का खतरा अपेक्षाकृत बढ़ जाता है। ऐसे समय में व्रत-उपवास करने और नियम-संयम का पालन करने से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। शरीर वातावरण के साथ अनुकूलन करता है और हमारे स्वास्थ्य की रक्षा होती है।



इस समय हवनादि करने से वातावरण भी शुद्ध होता है। शरीर के साथ-साथ हम मानसिक रूप से भी स्वस्थ, सक्रिय, संतुलित और शक्तिशाली होते हैं। आजकल की तनाव और भागदौड़ भरी जीवन-शैली में इसका महत्व और बढ़ जाता है। 



नवरात्र पर्व से संबंधित कुछ विशेष तथ्य 





  • नवरात्र को नवरात्रि, नवराते, माँ के जगराते आदि नामों से भी जाना जाता है। 

  • शारदीय और वासंतिक के अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश आदि कुछ स्थानों पर आषाढ़ी नवरात्र भी मनाया जाता है।

  • शारदीय नवरात्र का विशेष महत्व है।

  • गुजरात में इस समय डांडिया और गरबा का आयोजन बड़े पैमाने पर किया जाता है। 

  • पश्चिम बंगाल (कलकत्ता) में दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन किया जाता है जो दुनियाभर में प्रसिद्ध है। 

  • दुर्गा पूजा में कलाकारों द्वारा भव्य मूर्तियाँ बनाई जाती हैं और नवरात्रपर्यंत पूजन के उपरांत उनका विसर्जन किया जाता है। 

  • उत्तर-प्रदेश के सुलतानपुर जिले में भी कलकत्ता की तरह दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन होता है।  




ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणि नमोस्तुते।।



नवरात्र पर्व का माहात्म्य : आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण नवरात्र पर्व का माहात्म्य : आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण Reviewed by Bal krishna Dwivedi on 10/10/2018 Rating: 5

प्रेम और कुछ कविताएँ-रोहित ठाकुर

रोहित ठाकुर, पटना, बिहार | भारतीहिंदी ब्लॉग| bhartihindi.blogspot.com

__ प्रेम __


उन दोनों के बीच प्रेम था 
पर वह प्रत्यक्ष नहीं था
उन दोनों ने एक दूसरे को कई साल फूल भेजे 
एक-दूसरे के लिये कई नाम रचे 
वे शहर बदलते रहे और एक दूसरे को याद करते रहे
वे कई-कई बार अनायास चलते हुए पीछे मुड़कर देखते थे
उन्होंने कई बार गलियों में झाँक कर देखा होगा
फिर कई सदियाँ बीतीं 
वे दोनों पर्वत बने
पिछली सदी में वे बारिश बने 
इतना मुझे यकीन है 
इस सदी में वे ओस बने
फिर किसी सफेद फूल पर गिरते रहे॥


__ बारिश  ___


बारिश के दिनों में 
पानी की बूँद के छिलके फूलों पर गिरते हैं 
कोई गिलहरी का गिरोह दौड़ कर पास आता है 
और मायूस हो जाता है 
पानी की बूँद के छिलके अखरोट के छिलके नहीं होते
एक आदमी इस उम्मीद में है कि दुःख का छिलका 
उतरने के बाद सुख आता है॥


___ एक दिन  __


एक दिन जब तुम्हारी आँखों का पानी सूख जाये
पास कोई नदी न हो
तुम अपने अंदर की नमी को छूना
आ सको तो चले आना, मेरे सीलन भरे कमरे में
वहाँ बरसों से बादल का एक टुकड़ा खूँटी पर टँगा है
किसी एक दिन मैंने अपने हाथ से दीवार पर लिखा था 'बारिश'
उस दिन से मेरी उँगलियों से झड़ रही है मेह॥


रोहित ठाकुर  पटना, बिहार।



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हिन्दी में सर्वप्रथम

hindi me sabse pahle, hindi ka pahla - bhartihindi.blogspot.com


हिन्दी भाषा मूलतः देववाणी संस्कृत से निष्पन्न हुई है। अपने विकासक्रम में यह विभिन्न पड़ावों से गुजरती हुई आज वर्तमान स्वरूप में हमारे सामने है। ऐसे में हिंदी भाषा से संबंधित विभिन्न 'सर्वप्रथम' तथ्यों को जानना दिलचस्प होगा। हिन्दी के प्रथम कवि, साहित्यकार, हिन्दी का प्रथम नाटक, हिन्दी का प्रथम समाचार-पत्र, हिन्दी की पहली कहानी आदि ऐसे ही तथ्य हैं जिनके बारे में हम यहाँ जानेंगे।


प्रस्तुत है 'हिन्दी में सर्वप्रथम' की एक सारगर्भित सूची-

हिन्दी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग -    अमीर खुसरो
हिन्दी का प्रथम कवि -    सरहपाद
हिन्दी की प्रथम कवयित्री -    मीराबाई
हिन्दी के प्रथम गीतकार -    विद्यापति
हिन्दी की प्रथम  महिला कथाकार-     बंग महिला
हिन्दी का प्रथम ग्रंथ-     पउमचरिउ 
हिन्दी का प्रथम महाकवि-     चंदबरदाई
हिन्दी का प्रथम महाकाव्य -    पृथ्वीराजरासो
हिन्दी की पहली कहानी -    रानी केतकी की कहानी (इंशा अल्ला खाँ)
हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी-     इन्दुमती (किशोरी लाल गोस्वामी)
हिन्दी का प्रथम उपन्यास-     परीक्षागुरु
हिन्दी की प्रथम जीवनी -    दयानन्द दिग्विजय (गोपाल शर्मा)
हिन्दी की प्रथम आत्मकथा -    अर्धकथानक (बनारसी दास)
हिन्दी का प्रथम रेखाचित्र -   पदम पराग (पदम सिंह शर्मा)
हिन्दी का प्रथम यात्रा-वृत्तान्त-     लंदन यात्रा (हरदेवी)
हिन्दी में रचित प्रथम संस्मरण -    हरिऔध का संस्मरण (बालमुकुंद गुप्त)
हिन्दी का प्रथम रिपोर्ताज -    लक्ष्मीपुरा (शिवदान सिंह चौहान)
हिन्दी का प्रथम गद्य काव्य -   साधना (रायकृष्ण दास)
हिन्दी का प्रथम नाटक -    नहुष (गोपाल चंद्र)
हिन्दी का प्रथम गीतिनाट्य-     करुणालय (जयशंकर 'प्रसाद')
हिन्दी की प्रथम अतुकांत रचना-     प्रेमपथिक (जयशंकर 'प्रसाद')
हिन्दी का प्रथम एकांकी-     एक घूँट (जयशंकर 'प्रसाद')
हिन्दी का प्रथम समाचारपत्र -    उदंत मार्तण्ड (साप्ताहिक)
हिन्दी का प्रथम समाचारपत्र -    समाचार सुधावर्षण (दैनिक)
हिन्दी की प्रथम पत्रिका-          संवाद कौमुदी
हिन्दी काव्यशास्त्र की प्रथम पुस्तक-     साहित्य लहरी (सूरदास)
हिन्दी में छंदशास्त्र की प्रथम पुस्तक -    छंदमाला
खड़ी बोली हिन्दी के प्रथम लब्धप्रतिष्ठ कवि -    अमीर खुसरो
परिष्कृत खड़ी बोली हिन्दी के प्रथम लेखक -    रामप्रसाद निरंजनी
खड़ी बोली हिन्दी का प्रथम गद्य ग्रंथ -    भाषा योग वाशिष्ठ
हिन्दी के प्रथम बालसाहित्यकार -    श्रीधर पाठक
हिन्दी का प्रथम संगीत ग्रंथ -    मानकुतूहल
प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन -    नागपुर (सन् 1975)
हिन्दी साहित्य का प्रथम साहित्य अकादमी पुरस्कार- माखनलाल चतुर्वेदी (हिमतरंगिणी के लिए)
हिन्दी साहित्य का प्रथम ज्ञानपीठ पुरस्कार-    सुमित्रानंदन पंत (चिदम्बरा के लिए)
हिन्दी का प्रथम चलचित्र (फिल्म)  -   सत्य हरिश्चंद्र
हिन्दी की प्रथम बोलती फिल्म -    आलमआरा
हिन्दी का अध्यापन करने वाला प्रथम विश्वविद्यालय-   कलकत्ता विश्वविद्यालय
(फोर्ट विलियमकॉलेज)
हिन्दी का प्रथम अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय-     महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र
यह हमारा एक लघु प्रयास है; जिसमें हिंदी से संबंधित प्रथम तथ्यों को प्रस्तुत किया है। हमारा यह प्रयास आपको कैसा लगा, अवश्य अवगत कराएँ।
“हिंदी भारतीय संस्कृति की आत्मा है।“
कमलापति त्रिपाठी
हिन्दी में सर्वप्रथम हिन्दी में सर्वप्रथम Reviewed by Bal krishna Dwivedi on 10/07/2018 Rating: 5

Ghazal | मैं अपने साथ ग़ज़ल की किताब रखता हूँ



पेश है एक नई गजल Ghazal बिल्कुल नए अंदाज़ में-


ghazal in hindi - लब पे शबनम


लब पे शबनम मगर सीने में आग रखता हूँ।
हर एक सवाल का सीधा जवाब रखता हूँ।।

रोक ले मुझको ज़माना ये कहाँ मुमकिन है,
मैं अपने दिल में जज़्ब-ए-इंक़लाब रखता हूँ।।

उनसे कह दो कि भूल जायें मुक़ाबिल होना।
मैं अब चराग़ों की जगह आफ़ताब रखता हूँ।।

उनकी रुसवाइयों का और ग़िला क्या करना।
बस अपने साथ गजल की किताब रखता हूँ।।

बाल कृष्ण द्विवेदी 'पंकज'


मेरी यह नई Ghazal आपको कैसी लगी? कृपया अपनी राय अवश्य दें।





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