पुष्प की अभिलाषा-चाह नहीं मैं सुरबाला के

चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ।
चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ।।
चाह नहीं सम्राटों के शव पर, हे हरि, डाला जाऊँ।
चाह नहीं देवों के सिर पर चढ़ूँ, भाग्य पर इतराऊँ।।
मुझे तोड़ लेना बनमाली! उस पथ पर देना तुम फेंक।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक।।

                                               'माखनलाल चतुर्वेदी'

पुष्प की अभिलाषा-चाह नहीं मैं सुरबाला के पुष्प की अभिलाषा-चाह नहीं मैं सुरबाला के Reviewed by Bal krishna Dwivedi on 7/27/2014 Rating: 5

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